यूपी में फिर 'हार गई' महाबली मोदी की पार्टी
‘बुआ’ और ‘बबुआ ‘ कह कर तमाम बीजेपी नेता मायावती और अखिलेश यादव की जिस सियासी नजदीकियों का मजाकर उड़ाते रहे हैं , उसी बुआ और बबुआ का कॉम्बिनेशन इस दौर में देश की सियासत के सबसे बड़े महाबली मोदी के लिए सबसे बड़ी मुसीबत पैदा करने वाला है . यूपी बीजेपी के दो दिग्गजों योगी आदित्यनाथ और केशव मौर्या के गढ़ गोरखपुर और फूलपुर में तो बुआ और बबुआ के गठजोड़ का तीखा स्वाद चखकर बीजेपी नेता अपना जायका खराब पहले ही कर चुके थे , अब कैराना में भी पार्टी को तगड़ा करंट लग गया है . पार्टी बुरी तरह हार का सामना करने जा रही है . शर्मनाक हार .
औंधे मुंह गिर कर हार रही है तीसरे बड़े उपचुनाव में
बीजेपी सांसद रहे हुकुम सिंह के निधन के बाद खाली हुई उनकी सीट पर उनकी ही बेटी मृगांका सिंह आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हसन से हार रही हैं . नतीजे भले ही नहीं आए हैं लेकिन 75 हजार वोटों से पीछे चल रही मृगांका सिंह की हार को अब ऊपर वाला भी जीत में नहीं बदल सकता . तो मान लीजिए कि देश के महाबली मोदी और प्रदेश के महाबली योगी की पार्टी यूपी के तीसरे बड़े उपचुनाव में औंधे मुंह गिर कर हार रही है . ये वही बीजेपी है , जिसे 2014 में यूपी से 71 और 2017 विधानसभा चुनाव में करीब सवा तीन सौ सीटें मिली थी .
बजपा का नहीं खुला खाता
लोकसभा चुनाव में चतुष्कोणी मुकाबला था . बीजेपी एक तरफ थी तो दूसरी तरफ थी तीन पार्टियां . सपा , बसपा और कांग्रेस . नतीजा ये हुआ कि बजपा का तो खाता भी नहीं खुला . कांग्रेस को अपने हाईकमान के हिस्से की दो सीटें और सपा को मुलायम परिवार के हिस्से की पांच सीटें मिली . विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस साथ रहकर भी बीजेपी का कुछ नहीं बिगाड़ सकी , उल्टे जमींदोज होकर बीजेपी के विजय रथ के पहियों के नीचे आ गई . खेल शुरु तब हुआ , जब मायावती विपक्षी एकता का हिस्सा बनकर सपा के साथ आ गईं . गोरखपुर और फूलपुर में पहला प्रयोग सफल रहा और अब कैराना के नतीजे सामने हैं .
कैराना की सीट से जीत रहीं तबस्सुम हसन भले ही आरएलडी उम्मीदवार हैं , लेकिन कुछ दिनों पहले तक वो सपा में थीं . चुनाव से पहले आपसी सहमति के आधार पर सपा की नेता को अजित सिंह ने अपनी पार्टी में लाकर उन्हें टिकट दिया . तबस्सुम हसन 2009 में बीएसपी के टिकट पर कैराना से सांसद रह चुकी हैं . 2014 में उनके बेटे नाहिद हसन सपा के टिकट पर हुकुम सिंह के सामने मैदान में थे , जिन्हें करीब सवा तीन लाख वोट मिले थे . जाहिर है तबस्सुम की जीत के पीछे भी सपा -बसपा के वोटों को ट्रांसफर होना सबसे बड़ी वजह है .
कैराना का ये चुनाव कई मायनों में अहम है . यही वो कैराना है , जहां से दो साल पहले हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा उठाया गया था . बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने पहली बार ये मुद्दा उठाया और बीजेपी ने यूपी चुनाव से पहले कैराना को हिन्दू-बनाम मुस्लिम वाली राजनीति का प्रयोगशाला बनाने की कोशिश की थी . योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के तमाम नेताओं ने कैराना का जिक्र बार -बार किया था . अब उसी कैराना में बीजेपी का लोकसभा चुनाव हारना मायने रखता है . वैसे आपको ये भी बता दें कि जब यूपी में बीजेपी को सवा तीन सौ सीटें मिली थी , तब हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह विधानसभा चुनाव जीत नहीं सकी थीं .
औंधे मुंह गिर कर हार रही है तीसरे बड़े उपचुनाव में
बीजेपी सांसद रहे हुकुम सिंह के निधन के बाद खाली हुई उनकी सीट पर उनकी ही बेटी मृगांका सिंह आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हसन से हार रही हैं . नतीजे भले ही नहीं आए हैं लेकिन 75 हजार वोटों से पीछे चल रही मृगांका सिंह की हार को अब ऊपर वाला भी जीत में नहीं बदल सकता . तो मान लीजिए कि देश के महाबली मोदी और प्रदेश के महाबली योगी की पार्टी यूपी के तीसरे बड़े उपचुनाव में औंधे मुंह गिर कर हार रही है . ये वही बीजेपी है , जिसे 2014 में यूपी से 71 और 2017 विधानसभा चुनाव में करीब सवा तीन सौ सीटें मिली थी .
बजपा का नहीं खुला खाता
लोकसभा चुनाव में चतुष्कोणी मुकाबला था . बीजेपी एक तरफ थी तो दूसरी तरफ थी तीन पार्टियां . सपा , बसपा और कांग्रेस . नतीजा ये हुआ कि बजपा का तो खाता भी नहीं खुला . कांग्रेस को अपने हाईकमान के हिस्से की दो सीटें और सपा को मुलायम परिवार के हिस्से की पांच सीटें मिली . विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस साथ रहकर भी बीजेपी का कुछ नहीं बिगाड़ सकी , उल्टे जमींदोज होकर बीजेपी के विजय रथ के पहियों के नीचे आ गई . खेल शुरु तब हुआ , जब मायावती विपक्षी एकता का हिस्सा बनकर सपा के साथ आ गईं . गोरखपुर और फूलपुर में पहला प्रयोग सफल रहा और अब कैराना के नतीजे सामने हैं .
कैराना की सीट से जीत रहीं तबस्सुम हसन भले ही आरएलडी उम्मीदवार हैं , लेकिन कुछ दिनों पहले तक वो सपा में थीं . चुनाव से पहले आपसी सहमति के आधार पर सपा की नेता को अजित सिंह ने अपनी पार्टी में लाकर उन्हें टिकट दिया . तबस्सुम हसन 2009 में बीएसपी के टिकट पर कैराना से सांसद रह चुकी हैं . 2014 में उनके बेटे नाहिद हसन सपा के टिकट पर हुकुम सिंह के सामने मैदान में थे , जिन्हें करीब सवा तीन लाख वोट मिले थे . जाहिर है तबस्सुम की जीत के पीछे भी सपा -बसपा के वोटों को ट्रांसफर होना सबसे बड़ी वजह है .
कैराना का ये चुनाव कई मायनों में अहम है . यही वो कैराना है , जहां से दो साल पहले हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा उठाया गया था . बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने पहली बार ये मुद्दा उठाया और बीजेपी ने यूपी चुनाव से पहले कैराना को हिन्दू-बनाम मुस्लिम वाली राजनीति का प्रयोगशाला बनाने की कोशिश की थी . योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के तमाम नेताओं ने कैराना का जिक्र बार -बार किया था . अब उसी कैराना में बीजेपी का लोकसभा चुनाव हारना मायने रखता है . वैसे आपको ये भी बता दें कि जब यूपी में बीजेपी को सवा तीन सौ सीटें मिली थी , तब हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह विधानसभा चुनाव जीत नहीं सकी थीं .
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